अर्जुन

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आपका अहंकार अगर मुझे आपके सत्य का ग़ुलाम समझता है,

तो मेरी आज़ादी भी आपके अहंकार को ख़ारिज करती है।

आपकी भक्ती का कद्द अगर किसी के वजूद से ऊँचा है,

तो आपका वाजिब होना आपके ख़ुदा का ना होना है।

हर जायज़ सवाल का अगर वाजिब जवाब होता

तो उस युग से ही कृष्ण अर्जुन के रथ पे ना होता।

अब अगर हर वो सवेरा सिर्फ़ किसी जंग का अंजाम है,

तो मेरा उठना या लड़ना अब सब नाकाम है।

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पन्ने

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एक रोज़ कमरा साफ़ करते हुए कुछ पन्ने बिखर गए,
जो कभी किसी कौने मे काली स्याही से दबा के रखे थे।
लगा जैसे दिन के किसी रूठे अरमान को
टूटते ख़्वाब की किसी नींद से उठा लिया हो।
उजाले का शऊर पेहरेदार तुरंत चीख पड़ा,
शोर से पहले उन लफ्ज़ो को फिर वही दबा दो।
पर उन खड़ी सफ़ेद दीवारों का भीगा मुंतज़िर
उस सुखी स्याही को डुबना चाहता था।

झुठ

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शायद अंदर ही कुछ टुटा होगा,
जो मैं खंडरो मे तस्वीर ढूँढता हु।
इंतहा यु हो जाती हे
जब तन्हाई मे भी विराने खोजता हु।
अंधेरों को दिये देना तो वाज़िब हे,
पर धुप को मशाल दिखाना बेतुकी।
ख़ुद कि लड़ाई मे बेख़ुदी को हराना,
ख़ुद के ख़ुदा से ख़ुदाई को जिताना है।
ठीक केहते थे वो शायर,
जब तक ज़िंदा हु, मरा नहीं
और जब मर चुका तो मैं नहीं।

मौसम

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कभी थक जाता हु, कभी टुट जाता हु,
मगर मौसम की तरह मैं लौट भी आता हु।
कभी तड़कती धुप मे ख़ुश्क हवाओ को भी
सायों का पत्ता पुछते सुना हे।
और कभी गरजती बारिश मे
यु अंधेरों को भी जलते देखा हे।
यु तो हकिकत सी हे दुनिया
मगर ख़्वाब भी इसी मिट्टी कि इट के हे।
जब पहाड़ों को खिसकते देखा हे,
तो ख़्वाबों को भी टुटते सुना हे।
मगर कभी बादल और रात के सायों मे
उम् को थमते नहीं देखा।
आज जो कुछ उस पेड़ से छुटा हे,
कल इसी ज़मीन की गर्द से पेड़ बनके उठा हे।
कभी थक जाता हु, कभी टुट जाता हु,
मगर मौसम की तरह मैं लौट भी आता हु।

पेहरेदार

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उम्मीद पे सवालों के पेहरेदार खड़े हे,
और फ़ासला मेहेज्ज एक टुटते इंतज़ार का है।
सिरहाने रखा फ़ोन जल के भुझ गया हो,
या क्या पत्ता आज दिन अच्छा ना गया हो।
क्यु ना पेहेल अब मैं करु,
चार तु कहे और कभी दो मैं सुनाऊँ,
शिकायत तु करे और ख़लिश मैं बताऊँ।
बस ये उम् रात सी नहीं
पर ये रात जले तो उम् सी हो जाए।

मुस्तक़बिल

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जब भी यु ही हताश होता हु,
तो खुद से एक सवाल केहता हु।
ज़िंदा हु इसी लिए भुखा हु
या भुखा हु इसी को ज़िंदा हु!
अगर रात ख़्वाब ना दे
और सेहर तलाश,
तो करवट और धुप
किसी वाइज़ की कमज़र्फ बेखुदी लगती है।
फिर ख़यालो मे अगर गर्द ना हो,
तो इन तारो मे मुस्तक़बिल कहाँ!