रंग

ख़ुमार है या ख़ुशबू

रात है या कोई ख़्वाब।

ना जाने क्या दरियाँ है

जो ढूँडू तो सिरा नहीं मिलता।

तस्वीर है या आरज़ू,

आइना है या कोई शराब।

ना जाने वो क्या रंग है

जो अब इंतज़ार नहीं उतरता।

देहशत

देहशत के वही पुराने सड्डे बाज़ार से,

ख़बरें चीख़तीं है इंसानियत के नए मज़ार पे।

कौन कौन आएँगे, कहाँ कहाँ से लाएँगे,

कितने और भगाएँगे, यु क़तारों में कब तक दौड़ाएँगे।

सुना है, तीन हमारे आएँगे और दो उनके जाएँगे

क्यूँकि ख़तरें में वो बस तीन थे,

और जो छूट गए वो इंसानियत से ही यतिम थे।

कल यही कलाम शायद वहाँ भी लिखा था,

पर नफ़रत के बाज़ार का नया चोकीदार

स्वच्छता के कूड़े में नजाने कहाँ ढकेल गया।

कहते है कुछ इतिहास कहानियाँ बन जाते है,

पर ख़ौफ़ के दरबारों की स्याही सिर्फ़ काली ही होती है।

कल का इतिहास किसी आज़ाद के ख़ून से लिखा था,

पर इस नए घिनोने कल का इतिहास बस काला होगा।

अब एक नया तर्क-वितरक, गणित-भाग होगा,

राम प्रसाद बिस्मिल के नाम का भी विभाजन होगा।

ये नए राम प्रसाद शायद NRC मे आ भी जाए,

पर बचा हुआ बिस्मिल फुटपाथ से है तो शायद घुस्पेटिया ही क़रार होगा।

क्यूँकि नए फ़रमान में काग़ज़ ही यहाँ होने का प्रमाण है,

जो ग़रीब या बुढ़ा क़तार से टूट गया वो ग़ैर मुल्की,

बे-वज़ुद अब शायद ही इंसान है।

तीन हमारे आएँगे, दो उनके जाएँगे।

गुरुत्वाकर्शण

ये अंधेरे बाज़ार मे कब तक आइने बिकाएँगे,

अब किन किन को गुरुत्वाकर्शण समझाएँगे।

कल जहाँ जंगल जले थे, आज वहाँ शेहेर उठेंगे,

फिर जहाँ बस्ती जलाई थी वहाँ किम्मत उठेगी।

तरक़्क़ी का धुआँ फिर कोई नया बाज़ार बिछाएगा,

कल की हवस मे कोई कही फिर नंगा हो जाएगा।

सत्ता के जुनूँ का अंधा फिर कोई ख़ौफ़ दिखाएगा,

उजाले के पीछे फिर कोई अपना ही घर जलाएगा।

उसी उठती सफ़ेद राख के काले नए ख़रीदार आएँगे,

फिर एक नया घर और नेता शेहेर को बेच के जाएँगे।

फ़रमान

नए राजा का पेहला फ़रमान है,

पुरानी किताब के सभी अक्षर बेईमान है।

उन्ही पन्नो का अब फिर कोई काला नया ईमान है,

लफ़्ज़ वही मिज़ाज नए, अब यही इबादत का एलान है।

राज पाठ

राज हो या पाठ हो, धर्म हो या क़ानून,

जो समझता है वो लिखना नहीं चाहता,

जो लिखता है वो समझना नहीं चाहता।

उस ताज के नीचे बस सर ही देखे है,

ना कभी ताज ने कोई फ़्रक़ किया

और ना सिरों ने कभी कोई फ़िक्र करी।

कोई शान में तो कोई पेहचान में,

पर बुझे पड़े है वो सारे आज किसी शमशान मै।

कभी कोई लड़ कर ही महान हुआ,

तो कोई महान रहे इसलिए लड़ गया।

पर हाँ, लड़े वो सब।

अब वाजिब है फिर कोई कुचला होगा,

किसी का राज तो किसी का पाठ।

और जो रह गया वो सिर्फ़ इतिहास नहीं

शायद सिर्फ़ तोड़ी मरोड़ी कहानियाँ है।

क्यूँकि इस नए अंत मै सभी के राजा जीत गए,

हाँ, शायद ये सार ही है जो ताज के भी ऊपर था।

क्यूँकि ताज और सर, वक़्त जैसे नहीं

जो सार की तरह ज़रूरतों से बदले।

कभी कही बचपन में राम दियो से पेहचाने थे,

अब बस शोर और धुआँ है अंधेरे को बुझाने को।

तभी आज जो गुज़र गया वो मुड़ना नहीं चाहता,

उम्र है, ख़्वाब नहीं, के बस अब लौटना नहीं चाहता।

राज हो या पाठ हो, धर्म हो या क़ानून,

जो समझता है वो लिखना नहीं चाहता,

जो लिखता है वो समझना नहीं चाहता।

आईना

कहानी एक आईने की जो शायद उतनी ही झूठी हो,

जितनी ख़ाली ये इमारत उस भरे आम के पेड़ से है।

मेरा अक्स भी कभी इसपे मेरे ख़्वाबों के सायों की गर्म धूप जितना साफ़ था।

पर अब इस आईने से अपनी ख़बर पुछना, अख़बार की काली स्याही पढ़ने जैसा है।

पढ़ता तो उसे रोज़ ही हु पर शायद अब बीच का फ़र्क़ नहीं गिरता।

कमबख़्त वो इतना बेज़ार है की कभी हाल पूछू तो सवाल नहीं लेता।

कहानी एक आईने की जो शायद उतनी ही झूठी हो, जितना मैं..

अर्जुन

आपका अहंकार अगर मुझे आपके सत्य का ग़ुलाम समझता है,

तो मेरी आज़ादी भी आपके अहंकार को ख़ारिज करती है।

आपकी भक्ती का कद्द अगर किसी के वजूद से ऊँचा है,

तो आपका वाजिब होना आपके ख़ुदा का ना होना है।

हर जायज़ सवाल का अगर वाजिब जवाब होता

तो उस युग से ही कृष्ण अर्जुन के रथ पे ना होता।

अब अगर हर वो सवेरा सिर्फ़ किसी जंग का अंजाम है,

तो मेरा उठना या लड़ना अब सब नाकाम है।

पन्ने

एक रोज़ कमरा साफ़ करते हुए कुछ पन्ने बिखर गए,
जो कभी किसी कौने मे काली स्याही से दबा के रखे थे।
लगा जैसे दिन के किसी रूठे अरमान को
टूटते ख़्वाब की किसी नींद से उठा लिया हो।
उजाले का शऊर पेहरेदार तुरंत चीख पड़ा,
शोर से पहले उन लफ्ज़ो को फिर वही दबा दो।
पर उन खड़ी सफ़ेद दीवारों का भीगा मुंतज़िर
उस सुखी स्याही को डुबना चाहता था।

फज़ुल

मैं कितनी भी स्याही फेंकू खल़ा को
पर चोंच अगर क़लम कि ख़फ़ा हो
तो वो रात बेलुत्फ ही फज़ुल होती है।

झुठ

शायद अंदर ही कुछ टुटा होगा,
जो मैं खंडरो मे तस्वीर ढूँढता हु।
इंतहा यु हो जाती हे
जब तन्हाई मे भी विराने खोजता हु।
अंधेरों को दिये देना तो वाज़िब हे,
पर धुप को मशाल दिखाना बेतुकी।
ख़ुद कि लड़ाई मे बेख़ुदी को हराना,
ख़ुद के ख़ुदा से ख़ुदाई को जिताना है।
ठीक केहते थे वो शायर,
जब तक ज़िंदा हु, मरा नहीं
और जब मर चुका तो मैं नहीं।